मंगलवार, 1 अक्टूबर 2019

पुण्य का फल (कहानी)

करतार सिंह एक मामूली किसान थे, अपने परिवार के लिए दोनों जून खाने का इंतजाम करने में परेशान| उनके दो बेटे हुए, दुग्गल सिंह और भुग्गल सिंह| दुग्गल सिंह बचपन से ही कद-काठी से मज़बूत, हठी और उग्र स्वभाव का था| इसके विपरीत भुग्गल सिंह की काया कोमल थी और मन उससे भी कोमल, निश्छल, पवित्र| घंटों पूजा-पाठ करता था और सबसे झुक कर ही रहता था|
जवान होकर दुग्गल सिंह इलाके का सरग़ना बदमाश हो गया| दर्ज़नों क़त्ल और सैकड़ों डकैतियों के मुक़दमे सर पर लिए था लेक़िन पुलिस के बड़े-बड़े अफ़सर उसकी इज़्जत करते थे| इलाक़े भर के छोटे-बड़े नेता, चाहे वे किसी दल के हों, दुग्गल सिंह की कृपा के भिखारी थे| दुग्गल सिंह ने, सैकड़ों अपराधों को अंजाम देने के बावज़ूद, जेल तो क्या, कचहरी में कभी पाँव नहीं रखा| उसकी मूँछ फड़कने के हिसाब से फ़ैसले बनते-बिगड़ते थे| उसके ऊपर मुक़दमा करने वाले या उसकी निंदा शिकायत करने वाले जेल में, या खेत पर, या कचहरी में, या घर पर सोये-सोये, या अस्पताल में अपने आप मर जाते थे | दुग्गल सिंह पर माँ भवानी की कृपा थी|
माँ भवानी की पैरवी पर ही सही, दुग्गल सिंह माँ लक्ष्मी और माँ सरस्वती का भी चहेता बेटा था| अनेक तरीक़ों से उसने हज़ार बीघे ज़मीन को अपने नाम करवा लिया था| और तो और, उसने भुग्गल सिंह का हिस्सा भी हड़प लिया | बेचारे भुग्गल ने कोई शोर-शराबा नहीं किया| दुग्गल सिंह का डेरी का भी धंधा था, वह बड़ा कॉन्ट्रैक्टर भी था, शहर में रियल एस्टेट का फलता-फूलता धंधा था, दवाओं की दुकानें थीं, उसके बड़े होटल चलते थे, पेट्रोल पम्प थे, ट्रकों का कारोबार था | अफ़वाह थी कि वह ड्रग माफ़िया और हवाला के कारोबार से भी जुड़ा था, हालाँकि इन अफ़वाहों में कोई दम नहीं था |
इस अकूत संपत्ति के मालिक दुग्गल सिंह पर किसी प्रतिभाशाली कवि ने एक दुग्गल-चालीसा लिख डाली| दुग्गल सिंह बहुत खुश हुए और उन्होंने उस कवि को पाँच बीघे ज़मीन दे दी| इस से प्रभावित होकर इलाक़े के सारे कवि कविता लिख कर दुग्गल सिंह के नाम से छपवाने लगे| बीडीओ, सीओ, इत्यादि अफ़सरों ने उनकी इतनी प्रशंसा की कि दुग्गल सिंह कवि बन गए| उन्होंने माँ सरस्वती की कृपा भी हासिल कर ली| मैं भी दुग्गल सिंह की इज़्जत करता रहा हूँ; करना जरूरी है|
लेकिन काल पर किसी का वश नहीं चलता| समय पर दुग्गल सिंह बूढ़े हुए और मर गए| दुग्गल सिंह के बेटों ने सारे इलाक़े के लोगों को तीस तरह के व्यंजनों और चालीस तरह की मिठाइयों वाला भोज तीन दिनों तक जिमाया| व्यंजनों की संख्या तीस और मिठाइयों की संख्या चालीस इस बात पर तय हुई थी कि कारीगरों और हलवाइयों ने बतलाया कि इससे अधिक बनाना वे जानते ही नहीं हैं| लोग खाते-खाते थक गए लेक़िन दुग्गल सिंह के बेटे खिलाते-खिलाते न थके| ऐसा उम्दा भोज आज तक कहीं नहीं दिया गया, जब गाय-भैसों तक को मिठाइयाँ खिलाई गयीं|
दुग्गल सिंह की स्मृति में एक विशाल ठाकुरबाड़ी, एक शिवालय, एक माँ भवानी का मंदिर, एक बालिका विद्यालय और एक धर्मशाला बनी| दुग्गल सिंह का एक अलग़ मंदिर बना - दुग्गलधाम - जिसमें उनकी संगमर्मर की विशाल मूर्ति स्थापित हुई| इस मंदिर में तीस कमरे भी हैं जिसमें आये-गए संत डेरा जमाते हैं| साधु-संतों के खाने-पीने की व्यवस्था हैं; वे ख़ुद पका लें तो या पंडित रसोइये से पकवायें तो भी| वे जितने दिन चाहे, मंदिर में रहें|
मंदिर में आने वाले दुग्गल सिंह की मूर्ति पर फूल चढ़ाते हैं| शाम में उनकी आरती होती है और प्रसाद बंटता है| आरती और प्रसाद वितरण की व्यवस्था भुग्गल सिंह के बेटे (दुग्गल सिंह के भतीजे) के हाथ में है जिसे इस काम के लिए पाँच सौ रूपये प्रति मास मिलते हैं और मंदिर परिसर में दो कमरे मुफ़्त मिले हैं जिनमें वह सपरिवार रहता है| यही उसकी जीविका है| वह अपने चचेरे भाइयों का आभारी है|

शनिवार, 28 सितंबर 2019

आडम्बर, पाखंड, धर्मध्वजिता, और न्यायध्वजिता

भारत एक ऐसा देश है और भारतीयता एक ऐसी संस्कृति है जिसमें मनसा, वाचा, और कर्मणा एक होने के बगटुट उपदेश दिए गए हैं पर क़दम-क़दम पर इन तीनों के बीच न केवल खाइयाँ खोदी गयी हैं अपितु उन खाइयों को उत्तरोत्तर विस्तृत और सम्पोषित किया गया है| भारतीय संस्कृति की कुल जमा पूँजी है आडम्बर, पाखंड, धर्मध्वजिता और न्यायध्वजिता|
आगे बढ़ने के पहले आडम्बर, पाखंड, धर्मध्वजिता और न्यायध्वजिता की कामचलाऊ परिभाषा से अवगत होना लाज़िमी है| आडम्बर का तात्पर्य ऊपरी बनावट, तड़क-भड़क, टीम-टाम, झूठे आयोजन, ढोंग और कपट से है जिससे वास्तविक रूप छिप जाये| आडम्बर दृष्टिगोचर, शब्दगोचर या विचारगोचर (बुद्धिगोचर) हो सकता है| आडम्बर पाखंड भाव का आलम्बन है| विना आडम्बर के पाखंड को मूर्त और इन्द्रियगम्य नहीं बनाया जा सकता, पाखंड केवल पाखंडी के मन में रह जायेगा और उसका सम्प्रेषण नहीं हो सकेगा| पाखंडी को सर्वोदय वाली मीठी जुबान बोलनी होगी, सिक्यूलरिज़्म का गुणगान करना होगा, छापा तिलक लगाना होगा, आत्मा परमात्मा की एकता और इस दुनियाँ को माया सिद्ध करना होगा, खादी पहननी होगी, बेतरतीब दाढ़ी-बाल और कंधे पर झोला लटकाये, हफ़्तों विना ग़ुस्ल किये, पुलिया पर बैठना होगा, आवारा गायों को रोटी और चीटियों को चीनी खिलानी होगी, उचके पाजामे और जालीदार टोपी पहनने होंगे, गले की माला में क्रॉस लटकाना होगा, भगवे रंग की पुतली पहननी होगी, नीम-हकीमी को छुपाने के लिए गले से स्टेथोस्कोप लटकाना होगा|
पाखंड एक भाव है जो ठगने की नैसर्गिक प्रवृत्ति, जिसका मूलस्रोत जिजीविषा है, से अंकुरित होता है| जगज़ाहिर है कि शिकारी (predator) की सफलता इस बात पर निर्भर होती है कि शिकार (prey) की तुलना में उसके पास कितना अधिक ज्ञान और अवसर है| यह ज्ञान और अवसर की विषमता ही शिकार (hunting) का आधार है| स्वाभाविक है कि शिकारी और शिकार दोनों छिपेंगे, छद्मावरण (camauflaging) का सहारा लेंगे, एक-दूसरे को ग़लत इशारे सम्प्रेषित करेंगे और वस्तुस्थिति को उजागर नहीं करना चाहेंगे| शंका और विश्वास मौलिक प्रवृत्तियॉँ हैं लेकिन दोनों ही दुधारी तलवारें हैं| विश्वास के विना उपलब्ध अवसरों का दोहन तथा उपयोग (exploitation) नहीं हो सकता, पर अतिविश्वास जानलेवा हो सकता है| दूसरी तरफ़, शंका नए अवसरों को ढूँढने की प्रवृत्ति (exploration) को उकसाती है किन्तु अत्यधिक शंका अस्थिरता और चपलता को जन्म देती है और सफलता की भ्रूणहत्या कर देती है| विश्वास और शंका के साम्य में पाखंड और उसके आलम्बन (आडम्बर) का बहुत बड़ा रोल है जो शिकार के मन में विश्वास पैदा करता है| शिकारी इसी विश्वास का फ़ायदा उठाता है|
धर्मध्वजिता पाखंड और उसके आलम्बन का वह रूप है जिसमें धर्म के टोटकों का प्रयोग होता है| सर्वधर्मसमानत्व, धर्मनिरपेक्षता इत्यादि नारों से लेकर धार्मिक कट्टरता और हिंदू, मुस्लिम या ईसाई ज़िहाद धर्मध्वजिता के उदाहरण हैं| किसी मनुष्य का चिंतन, उसकी भाषा, उसके हाव-भाव, उसकी आचारपरक मान्यताएँ इत्यादि उसके पालन-पोषण की संस्कृति के सर्वदा निरपेक्ष हो ही नहीं सकती| गाँधी जी तक ने ईश्वर और अल्लाह की एकता बतलायी, लेक़िन उनके भजन में मुलुंगु या न्याकोपोन (अफ्रीका के भगवान) तो नहीं आये, हालाँकि वह अफ़्रीका में रह चुके थे| कोई भी व्यक्ति अपने कल्चरल मैट्रिक्स से बाहर नहीं निकल सकता, और कल्चरल मैट्रिक्स से बाहर होने का ढोंग - धर्मनिरपेक्षता - धर्मध्वजिता है, पाखंड है, आडम्बरधारिता है, शिकारी प्रवृत्ति है| यही हालत उनकी है जो इस दुनियाँ को माया और मिथ्या बतलाते हैं पर मठों में महंत बने बैठे हैं या आश्रमों में चकला चलाते हैं, या धन की लोलुपता में गोद ली हुई बेटी तक से निक़ाह पढ़ने को तैयार हैं| यही धर्मध्वजिता थी जिसकी वज़ह से हज़ारों दृढ़संयमी नन्स (nuns) डायन कहकर जिंदा जला दी गयी थी, हालाँकि इसका मूल कारण धर्मगुरुओं की अदम्य और आपराधिक कामुकता थी|
चाहे सौ वर्षों तक मुकदमा चलता रहे लेक़िन किसी बेग़ुनाह को सज़ा नहीं देंगे की ज़िद न्यायध्वजिता है| चाहे हज़ार दोषी अभयारण्य में विहार करते रहें लेक़िन एक निर्दोष को सलाख़ों के अंदर नहीं होने देंगे, यह टेक न्यायध्वजिता है| हम औरतों की शिकायतों को सदासत्य मानेंगे और मर्दों को जन्मजात अपराधी मानेंगे - और हम ऐसा करेंगे डंका पीटकर - यह न्यायध्वजिता है| कोई नहीं मानेगा कि यह सब न्यायधारियों और न्यायकारियों की भीरुता या असंवेदनशीलता के चलते होता है| हर एक व्यक्ति को बोलने का - कुछ भी बोलने का - अधिकार है| कोई किसी को पप्पू कह सकता है, चायवाला कह सकता है, घूसखोर कह सकता है, चरित्रहीन कह सकता है और विना किसी उत्तरदायित्व के, विना किसी पुख्ते प्रमाण के| यह है बोलने की आज़ादी की रक्षा और यही न्याय की कसौटी है; इसी को न्यायध्वजिता - इंसाफ़ का परचम लहराना कहते हैं| आज की जातिवादिता, पिछडेपन की गुहार, सामाजिक न्याय, आरक्षण, संस्कृति की रक्षा, वेदवादिता, मनुवादिता, इत्यादि न्यायध्वजिता के ही लक्षण हैं| छद्मन्यायपरता (न्यायधर्मिता का दिखावा) के पाखंड ने न्याय के छद्म से किस तरह अपराधियों की रक्षा की है यह जग-ज़ाहिर है| अधिकांश बड़े अपराधी छुट्टे सांढ़ की तरह घूमते रहे और उन्होंने न्यायव्यवस्था का मज़ाक बना दिया| नेता और अपराधी मिल गए; अपराधी नेता बनकर विधायक बन गए और नेताओं का वर्चस्व बाहुबल से स्थापित होने लगा| न्याय की प्रक्रिया इतनी जटिल, लस्त-पस्त, छिद्रपूर्ण, लचर, और दीर्घसूत्रितापूर्ण कर दी गयी जिसमें केवल अपराधी ही पनप सके, जी सके, विकास कर सके| धार्मिक बहुलवाद (रिलीजियस प्लूरलिज़्म) , सिक्युलरिज़्म, धार्मिक सहिष्णुता, और सामाजिक न्याय (सोशल जस्टिस) के पाखंड के भीतर अन्याय, उपेक्षा और तरफ़दारी की फ़सल उगायी गयी जहाँ भारत की बहुसंख्यक जनता मार खाकर भी रो नहीं सकी| हमारी न्यायव्यवस्था एक अंधी देवी है जिसके हाथ में न्याय की तराजू ज़रुर है, लेकिन वह देख नहीं सकती की डंडी समतल है या नहीं| तीन गाँधीवादी बन्दर लगे हुए हैं पलड़ों को बराबर करने और जिधर का पलड़ा नीचे होता है उधर की रोटी से एक कौर काट लेते है| अंधी देवी और तीन प्रपंची बन्दर|

देवात्मक मानवतावाद के पाखंड में मानव को देवोचित गुणों से भरपूर माना गया हालाँकि धरातल पर आदमी पशुता से भरा हुआ है| इस पाखंड में यह माना गया कि धनाढ्य वर्ग, उद्योगपति और व्यापारी धन के न्यासरक्षक (ट्रस्टी) के रूप में स्वार्थहीन रूप से काम करेंगे| उदाहरण के लिए वे अपनी कमाई का अधिकांश (80% से 95% तक) हिस्सा टैक्स दे देंगे जिससे समाज का कल्याण होगा| राजनीतिक नेतागण भूखे पेट, खादी कपड़े धारण कर, जनकल्याण के लिए दर-दर भटकेंगे और सत्ता से कोई व्यक्तिगत फ़ायदा नहीं उठायेंगे| जमींदार करुणावश अपनी ज़मीन को भूमिहीन जनता में बाँट देंगे| सर्वोदय के नटवरलालों ने अनेक तरह की नौटंकियाँ कीं और ज़मीन के बँटवारे का नारा एक छलावा होकर रह गया| शिक्षकगण पेट में कपड़ा बाँधकर सरस्वती की उपासना करेंगे| वक़ील और न्यायाधीश दूध का दूध और पानी का पानी करने के लिए जान लड़ा देंगे| पुलिस के लोग डंडे लेकर अपराधियों को नियंत्रित कर लेंगे| यह मान लिया गया और इसे मनवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी कि विश्वशांति की घोषणा और कबूतरबाज़ी के चलते भारत के कोने-कोने में बुद्ध पैदा होंगे और सारे अंगुलिमाल कंठी धारण करके मेवानिवृत्त हो जायेंगे| इत्यादि|
समाजवादिता के पाखंड को एक सुनहरा नाम देकर जनमानस पर चस्पा किया गया| इसका नाम था सोशलिस्टिक पैटर्न ऑफ़ सोसाइटी (या सोशलिस्टिक पैटर्न ऑफ़ कैपिटलिस्टिक सोसाइटी, जिसमें कैपिटलिस्टिक शब्द को गूढ़ रखा गया)| इसकी विस्तृत विवेचना डा. शिवचंद्र झा की पुस्तक (Studies in the Development of Capitalism in India, Firma K. L. Mukhopadhyay, 1963) में है जिसमें दिखाया गया है कि समाजवादिता की आड़ में किस तरह भारतीय पूँजीवाद का विकास हुआ और किस तरह उद्योगपतियों और व्यापारियों के स्वार्थ के लिए राष्ट्रीय हितों का वलिदान किया गया| डा. प्रणब बर्धन की पुस्तक (The Political Economy of Development in India, Oxford. University Press, Delhi) में यह दिखाया गया कि किस तरह व्यापारियों/पूँजीपतियों, जमींदारों और नेताओं की तिकड़ी ने गंभीर साज़िश की तहत जनता और देश के संसाधनों की लूट मचाई| प्रो. अशोक रूद्र ने दिखाया [Emergence of the Intelligentsia as a Ruling Class in India, ASHOK RUDRA, Indian Economic Review, New Series, Vol. 24, No. 2 (July-December 1989), pp. 155-183] कि कैसे बुद्धिजीवी वर्ग ने उस तिकड़ी को सराहा और बुद्धिजीवी वर्ग अपने स्वार्थों के लिए उस तिकड़ी के हाथ बिक गया| इन कारणों से भारत क्रोनी कैपिटलिज़्म (Crony Capitalism) का नमूना बन गया| हम समाजवादिता और आदर्शवादिता का राग अलापते रहे और प्रच्छन्न पूँजीवाद बढ़ता रहा| काले धन, काली अर्थव्यवस्था और काली मनोवृत्ति हमारे जनमानस और कार्यकलापों पर छा गयी| इसका इलाज़ पाखंड में नहीं है, प्रकट होने में है| पूँजीवाद को झूठे आदर्शवाद से रोका नहीं जा सकता है|  
हम भारतीय इस तरह की अनेक पाखंडों में लिप्त हैं| ख़ास करके बुद्धिजीवी वर्ग इसमें अधिक लिप्त है| लेक़िन ध्यान रहे, झूठ के पाँव नहीं होते| आज न कल हम भरभराकर ढह जायेंगे|

गुरुवार, 26 सितंबर 2019

कर्म और फल

कर्म और फल से सम्बंधित दो वचन प्रचलित हैं - (१) कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन (आपका जुरिस्डिक्सन कर्म है, उसका फल नहीं), और (२) अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्मं शुभाशुभं (कर्म शुभ हों या अशुभ, उन्हें - उनके फलों को - भोगना ही होगा)| पहले वचन का (जो फैशनेबल होने की हद तक चालू है), बहुधा ग़लत प्रयोग होता है| प्रायः लोग अधिकार की जग़ह कर्त्तव्य और आशा का प्रतिस्थापन कर देते हैं हैं - जैसे कर्म किये जाओ, फल की आशा मत करो, इत्यादि| एक और समस्या खड़ी होती है तृतीय वचन से - अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच (चिंता मत करो, मैं - भगवान - तुम्हें - अर्जुन को - सब पापों से मुक्त कर दूंगा)| अगर अवश्यमेव भोक्तव्यं तो भगवान किसी को पापमुक्त कैसे कर देंगे?
अगर ठीक से मीमांसा न हो तो उपर्युक्त वचन भ्रान्ति पैदा कर सकते हैं| अगर दूसरा वचन सार्वभौम सत्य है तो फल पर अधिकार या फल की आशा का कोई अर्थ नहीं रह जाता| अगर पहला वचन सत्य है (कर्म का फल से अपरिहार्य सम्बन्ध नहीं है - कर्म फलीभूत हो सकता है या नहीं भी हो सकता है) तो दूसरे वचन पर प्रश्नचिह्न लग जाता है| तीसरा वचन तो कर्म और फल के सम्बन्ध को सर्वथा तोड़ देता है|
इस विकार की उत्पत्ति का मूल कारण व्यष्टि और समष्टि का गड़बड़झाला है जो हमारे शास्त्रों की व्याख्या (commentaries) में सर्वत्र व्याप्त है| द्वितीय वचन की व्याख्या में यह प्रश्न नहीं उठाया गया है कि अगर 'अवश्यमेव भोक्तव्यं' तो 'केन भोक्तव्यं?'| कर्म के अपरिहार्य फल का भोक्ता कौन होगा? कर्त्ता (व्यक्ति) या समाज (समष्टि)?
जब भारत स्वतंत्र हुआ तो काश्मीर की स्थिति बहुत स्पष्ट नहीं रखी गयी| लेकिन आगे चल कर इस अस्पष्टता ने दर्ज़नों समस्याओं को जन्म दिया जिनके चलते लोग बेघर हुए, मरे, बेइज़्ज़त हुए, दरिद्र हुए, कुछ लोग संपन्न हुए, राजा बन गए, वग़ैरह| व्यक्तियों के किये कर्म का फल कर्त्ता ने नहीं, समष्टि ने भोगा जो अकर्त्ताओं को भी भुगतना पड़ा| भोपाल गैस कांड के फल के भोक्ताओं पर नज़र डालिये - क्या वे कर्त्ता थे? हिरोशिमा पर अणुबम गिरा और उसके फल संततिरेखा पर पड़े| क्या संतति कर्त्ता थी? मैं रात में चुपचाप सड़क पर गढ्ढे खोदकर ढँक दूँ| मुँहअँधेरे लोग और गाड़ियाँ गड्ढे में गिरेंगे| कर्त्ता मैं, भोक्ता कोई और|
हमारे शास्त्रों ने इसे प्रारब्ध की संज्ञा दी है, पूर्वजन्म के कृत कर्मों का फल बतलाया है और क्या-क्या अनाप-शनाप नहीं कहा है [जैसे "यथा धेनु सहस्त्रेषु वत्सो विन्दति मातरम् | एवं पूर्वकृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति।" बछड़ा अपनी माँ को हज़ारों गायों में ढूंढ लेता है, उसी तरह पूर्वकृत कर्म अपने कर्त्ता को ढूंढ लेता है| कविता के तौर पर अच्छी चीज़ है,लेकिन मैंने बछड़ों को अपनी मौसियों का दूध पीते भी देखा है] | हमारे विचारकों को सीधी-सी बात नहीं सूझी कि कर्म और उसके फलों की व्याप्ति अलग़-अलग़ है| कर्म कर्त्ता से चिपका रहता है लेक़िन कर्म के फल समष्टि में फैल जाते हैं, व्यष्टि के अधिकारक्षेत्र से बाहर चले जाते हैं| इसे समझने के लिए प्रारब्ध या पुनर्जन्म की परिकल्पना की कोई आवश्यकता नहीं है| गाली आप देते हैं, गुस्सा मुझे आता है| इतनी छोटी-सी बात व्याख्याकारों को नहीं सूझी और बड़ी-बड़ी बातें कह गए| विद्वान पुरुषों के यही लक्षण हैं| तो 'केन भोक्तव्यं' का उत्तर है 'निश्चयरूपेण समाजेन भोक्तव्यं, समष्टिणा भोक्तव्यं| कदाचित कर्त्ता अपि भोक्ता भवति'| कर्म का फल कदाचित कर्त्ता को, पर निश्चय रूपेण समाज को, भोगना होगा| अच्छे कर्म सामाजिक कर्त्तव्य हैं, बुरे कर्म सामाजिक रूप से हानिकारक हैं| डकैतों के संपन्न जीवन को - वे दान ज़कात के पुण्यकार्य भी करते रहते हैं - उनके पूर्वजन्म के कर्मों से न जोड़ें|
महाराजा अंधा था, महारानी ने आँखों पर पट्टियाँ बाँध रखी थी| पातिव्रत धर्म की चोंचलेबाजी राजधर्म (राजमहिषी धर्म) पर छा गयी थी| बेटे (राजकुमार) शक्तिशाली थे और उच्छृंखल भी| मंत्रिमंडल दुष्ट और चापलूस था| प्रधान सेनापति अपनी भ्रमित प्रतिज्ञा का दास था, हालाँकि शुक्रनीति, शक्रनीति, बृहस्पतिनीति और परशुरामनीति का पंडित था| गुरु जी अर्थ के दास थे और पुत्रवाद तथा द्वेष से पीड़ित थे| जहाँ समाज इतनी बीमारियों से पीड़ित हो वहाँ कर्म के फल पर कर्त्ता का अधिकार कैसे हो सकता है? समाज जितना नियमबद्ध होगा, कर्म और उसके फल का सम्बन्ध उतना ही सम्भवतापूर्ण होगा| नियमहीनता (chaos) ही संबंधों को प्रोबैबिलिस्टिक (probabilistic या stochastic) बनाती है, अनिश्चितता को जन्म देती है| ऐसी स्थिति में केवल कर्म पर ही अधिकार हो सकता है|
कर्म और फल के संबंधों के तीन निर्णायक हैं - (१) कर्त्ता के चेतन/अचेतन में किये गए व्यापार, उनकी दिशा, गुणवत्ता तथा परिमाण - इसे कर्म से सम्बोधित किया गया है, (२) कर्त्ता के अतिरिक्त अन्य मानवीय या सामजिक घटकों के द्वारा जाने-अनजाने किये हुए कर्म, जिसे भाग्य कहा जाता है और जो पूर्वजन्मार्जित न होकर समाजार्जित होता है, समष्टि-अर्जित होता है, और (३) प्राकृतिक घटनाएँ जो मानव के वश में नहीं हैं - याने शुद्ध मानवेतर या प्रारब्ध या अदृष्ट | प्रारब्ध कर्म और फल के संबंधों को closure property देता है जो logical requirement है|
हमारे शास्त्रों के व्याख्याकारों ने भाग्य और अदृष्ट (प्रारब्ध) को मिलाकर एक खिचड़ी बनायी| इसका उद्देश्य समष्टिवाद पर व्यष्टिवाद का आरोपण था जो ऋत (ontological Truth) नहीं था, पर नैतिक रूप में उपादेय था - वह धर्मार्थक सत्य था, आचरणीय सत्य था, उपयोगी सत्य था, प्रैग्मैटिक ट्रुथ (Pragmatic Truth) था| हम इसी अन्तर को नहीं समझ पाए और उलझ गए|

रविवार, 22 सितंबर 2019

वास्तविक जीवन और अतीत का मोह

हो सकता है कि यह मेरी अल्पज्ञता के कारण हो, किन्तु मेरा सोचना है कि भारतीय वाङ्मय असंतुलित है| इसमें आत्मचिंतन, सन्यास, आराधना, दर्शन, भाषा, काव्य और स्वास्थ्य के वारे में बहुत कुछ है किन्तु जड़ प्रकृति को समझने के लिए बहुत कुछ नहीं है (या लुप्त है)| इसका एक कारण तो यह हो सकता है कि जिस युग में भारतीय वाङ्मय का विकास हुआ उसमें कृषि और पशुपालन के सिवा और कोई धंधा विकसित नहीं हुआ था| या जो और धंधों के जानकार थे वे किताबें नहीं लिखते थे (ग्रन्थ का निर्माण नहीं कर सकते थे) और जो किताबें लिख सकते थे वे धंधों के गुर नहीं जानते थे, केवल पूजा-पाठ और आत्मचिंतन में व्यस्त थे| शायद इसी के चलते कहा गया था - वेदाः कृषिविनाशाय कृषिर्वेदविनाशिका (वेद और कृषि एक दूसरे के विनाशक हैं)|
समाज दो हिस्सों में बंटा था - एक हिस्सा (श्रमिक, कारीगर) भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता था और दूसरा हिस्सा (अभिजात वर्ग, खास करके बुद्धिजीवी) भौतिक आवश्यकताओं की अवहेलना करता था| दोनों हिस्सों में तारतम्य नहीं था; बौद्धिक हिस्से का विचार था कि श्रमिक हिस्सा अछूत है और पढ़ाई-लिखाई पर उसका अधिकार नहीं है| नहीं तो ऐसा कैसे हुआ कि अशोक स्तम्भ बना लेकिन उसकी धातुविद्या (metallurgy) पर कोई लेख नहीं है (या यह विचार मेरी अल्पज्ञता के चलते है)| जो सभ्यता इतना अच्छा इस्पात बना लेती थी उसने काग़ज़ की ईज़ाद क्यों नहीं की (जब कि कपड़े और भोजपत्र पर लिखाई प्रचलित थी)| राजनीति और अर्थशास्त्र पर कौटिल्य का अर्थशास्त्र है जिसमें बृहस्पति और शुक्र की नीतियों का उल्लेख है, किन्तु हथियार बनाने की विद्या पर काफ़ी पुस्तकें क्यों नहीं हैं? रण व्यूहों का उल्लेख है किन्तु उन पर विस्तृत किताबें क्यों नहीं हैं? 'काव्येन गिलितं शास्त्रं' (काव्य ने शास्त्र को निगल लिया, यानि शास्त्रों के लेखन में कविता इतनी है कि शास्त्र गौण हो गया है) की प्रवृत्ति क्यों पनपी और फली-फूली? भाषा के अलंकार ने ज्ञान को क्यों ढँक लिया? सारा गृहस्थ जीवन पूर्वमीमांसा का ग़ुलाम और तदुपरांत जीवन उत्तरमीमांसा को समर्पित क्यों हुआ| मध्यमीमांसा पर कुछ नहीं है, क्यों?
हम भारतीयों को पुरातन और अतीत से बड़ा लगाव है| अच्छी बात है| लेकिन हम में अपने वर्तमान और भविष्य को अतीत पर न्योछावर कर डालने की इतनी ललक क्यों है? मैं नहीं जानता|

शनिवार, 21 सितंबर 2019

क्या वाल्मीकि आदिकवि थे?

ऐसा माना जाता है कि महर्षि वाल्मीकि आदिकवि थे| उनके मुँह से पहली कविता निकली थी - छंदबद्ध - अनुष्टुप - "मा निषाद प्रतिष्ठां त्वं। .." इत्यादि|
मैं मानकर चलता हूँ कि वेद रामायण से पहले बने| रामायण में वेदों के होने का उल्लेख है|
कविता अगर छंदोबद्धता है तो क्या छंदोबद्ध रचना, पहली वार, वाल्मीकि ने की? क्या अनुष्टुप (अनुष्टुव) छंद की रचना वाल्मीकि ने की? उत्तर है, नहीं| शीक्षा (उच्चारणशास्त्र) और छंद (prosody) तो वेदांग रहे ही हैं| वेदों में सीधे (linear, periodic) और ऋजु (non-linear, aperiodic) दोनों तरह के छंद प्रचुर रूपों में आये हैं| वेदों में कम से कम 15 प्रकार के छंद प्रयुक्त हुए हैं।वार्णिक और मात्रिक दोनों तरह के छंदों के उदाहरण मिलेंगे| ऋग्वेद में सात तरह के छंद भरे पड़े हैं - वे हैं, गायत्री, अनुष्टुव, त्रिष्टुव, जगती, उष्णिह, बृहती, और पंक्ति| कुल ऋचाओं में त्रिष्टुव और गायत्री की संख्या सबसे अधिक है|
अगर कविता का मतलब भाषा का अलंकार है, तब भी वेदों की ऋचाओं में इसकी कमी नहीं है| उनमें रस का भी अभाव नहीं है| हाँ, अगर करुण रस को ही कविता का नाम मिले तो दूसरी बात है| उस दृष्टि से रामायण के अधिकतर श्लोक अकविता की श्रेणी में आयेंगे और prose (गद्य) और prosody (पद्य) का भेद मिटाना होगा|
मेरे लिखने का उद्देश्य यह इंगित करना नहीं है कि वाल्मीकि महाकवि नहीं थे| अवश्य थे, लेक़िन आदिकवि नहीं थे; पद्यों, छंदों, अलंकारों और रसों का वांग्मय में उद्भव और प्रवर्तन उनके पहले ही (वेदों में) हो चुका था| ऐसा मानना कि महर्षि वाल्मीकि के मुख से "मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः । यत् क्रौञ्चमिथुनादेकमवधी: काममोहितम् ।।" श्लोक के रूप में भगवती सरस्वती का प्राकट्य हुआ और ऐसा ब्रह्मा जी ने स्वयं उन्हे (वाल्मीकि को) बतलाया है, मिथक नहीं, मिथ्या है| जिन ऋषियों ने वेदों की ऋचाओं की रचना अनेक पद्यों में की, वे निश्चित रूप में वाल्मीकि से पहले के कवि थे| भगवती सरस्वती का प्राकट्य वेदों की ऋचाओं में हुआ था|

भारतीय संस्कृति में पुरुषार्थ

मानव होने के महत्त्व के प्रतिपादन को पुरुषार्थ (the significance of one's being) कहा गया है| इसके चार पहलू हैं - काम, अर्थ, धर्म और मोक्ष|
इच्छाएँ काम हैं - चाहे वह इच्छा जीवन को चलाने (sustenance) के लिए हो या जीवन की तारतम्यता (perpetuity) और प्रसार (proliferation) के लिए हो| इच्छाओं का होना मानव के लिए ही नहीं वरन पशुओं और पेड़-पौधों के लिए भी सहज गुण है|
काम की पूर्ति के लिए साधनों की आवश्यकता होती है| साधनों की चिंता करना, उन्हें ढूँढना, उनका इंतजाम करना अर्थ कहलाता है| अर्थ का इंतजाम करना जीवों का सहज गुण है|
धर्म उन विचारों एवं क्रियाकलापों का नाम है जो केवल अपने काम और अर्थ के लिए ही नहीं, वरन अपने से बाहरी दुनियाँ (समाज, सम्पदा, परिस्थिति आदि) के लिए हितकारी हैं| सारे जीव ऐच्छिक या अनैक्षिक रूप से धर्म में कमोबेश प्रवृत्त होते हैं| जाति के हित में अपना बलिदान और परोपकार की भावना (altruism) जानवरों में भी पायी जाती है| मानव की धर्म में प्रवृत्ति बहुधा ऐच्छिक और सज्ञान होती है|
मोक्ष पुरुषार्थ का अंतिम महत्त्व है| यह तत्वज्ञान और अनंत कल्याण से होता है| समझ कर्त्ताभाव से ऊपर उठकर द्रष्टाभाव (साक्षीभाव) की प्राप्ति है| मोक्ष व्यक्ति को काम, अर्थ और धर्म के बंधनों से मुक्त कर देता है| मोक्ष एक वैचारिक स्थिति है| जब किसी खेलते बच्चे का खिलौना टूट जाता है तो वह रोने लगता है, पर माँ-बाप रोते नहीं| बच्चे को आश्वासन देते हैं कि दूसरा खिलौना ला देंगे| इसी भाव से जीना मोक्ष कहलाता है|

मंदी का कारण

मनमोहन सिंह बोले कि विमुद्रीकरण (demonetization) और GST दोनों ने अर्थव्यवस्था की नींव हिला दी (https://in.yahoo.com/…/demonetisation-gst-key-reasons-slowd… )|
सोचने की बात है कि विमुद्रीकरण के साथ पुराने नोटों को नए नोटों से बदला गया| तो इसका प्रभाव तात्कालिक ही होगा, टैक्स तो लोग/व्यापारी देते ही थे | अगर एकमुश्त GST दे दिया तो दिक़्क़त क्यों हो?
लेक़िन समझना होगा कि विमुद्रीकरण के चलते ब्लैक मनी को धक्का लगा और बहते काले धन और उसकी अन्डरहैन्ड तरलता को धक्का लगा| GST ने इनडायरेक्ट टैक्स की चोरी पर लग़ाम कसी|
मंदी के लिए काले धन और टैक्स की चोरी पर नियंत्रण (जो मोदी ने किया) उत्तरदायी है| और ऐसा करने के लिए मोदी उत्तरदायी है| मोदी अगर काले धन और कर-चोरी करने वालों से बरज़ोरी नहीं करता तो सबकुछ बल्ले-बल्ले रहता| विमुद्रीकरण (demonetization) और GST दोनों ने काली अर्थव्यवस्था की नींव हिला दी| काले धन और काली पूँजी ने शिक़स्त खायी तो हमारी अर्थव्यवस्था (जिसकी दो तिहाई काले धंधे पर आधारित थी) हिचकोले खाने लगी| इसी सेटबैक ने मंदी का आह्वान किया| भारतीय अर्थव्यवस्था में जड़ जमाये भ्रष्टाचार की तरफ़ सबसे पहले गुन्नार मिर्डल (1968) ने अपनी क़िताब 'एशियन ड्रामा' में इशारा किया था| लेक़िन एशियन ड्रामा कौन पढता है?
मनमोहन सिंह जी खुल कर भ्रष्टाचार की बात नहीं कर सकते | अपनी रोटी भी तो सेंकनी है|